Бабушка и Вовкa (А. Аксёнова)
Раньше Вовка, его мать и отец жили на севере, в Мурманске. Но три года назад его мать заболела и умерла. Его отец, капитан, часто бывал в море, и сначала соседка брала Вовку к себе домой. А потом отец решил отправить его на каникулы в деревню к бабушке.
Сначала бабушка ему не понравилась. Вовка привык, что все друзья и знакомые очень жалели его. А бабушка не жалела его.
В первый же день, когда отец уехал, Вовка разбил ногу. У него очень болела нога, и он долго и громко плакал. Но бабушка спокойно сказала ему: «Не плачь! Ты уже не маленький!» А потом послала его в магазин за хлебом. И Вовка пошёл.
Он принёс хлеб и бросил его на стол:
—Вот вам хлеб.
—Ты что это, как ты разговариваешь? — сердито сказала бабушка.
Вовка молчал. Он сказал, что не хочет ужинать, и думал, что бабушка спросит, почему, и обязательно даст ему поужинать. Но бабушка ничего не спросила и не дала ему ужин. Утром Вовка должен был принести воды, купить хлеба в магазине, а потом ещё помогать бабушке в поле. Вовке всё это очень не нравилось. Однажды он сказал бабушке: «Напишите отцу, чтобы он приехал и взял меня».
—Ничего, привыкнешь,—ответила бабушка.
—Я всё расскажу отцу. Почему я должен всё время работать? У меня сейчас каникулы, и мне нужно отдыхать, а я целый день работаю.
—Другие работают, и ты не маленький.
—Я ещё только во втором классе учусь! Мне девять лет всего.
—Вот я и говорю, что ты уже большой. Когда мне было девять лет, я уже в поле работала.
Тогда Вовка решил делать всё очень плохо. Он думал, что если он будет делать всё очень плохо, бабушка не будет заставлять его работать. Однажды он не пошёл в магазин, вечером бабушка сказала: «Сегодня не будем ужинать. У нас нет хлеба». Вовка пошёл спать голодный. «И ничего тебе не поможет,— сказала ему бабушка, которая всё поняла.— Ты будешь здесь жить и привыкнешь работать. И ещё полюбишь свою бабушку».
Вовка сердито посмотрел на неё, но ничего не сказал.
На следующий день Вовка рассказал о бабушке своему другу Вите. Но Витя сказал ему:
—Ты ещё не знаешь её, она что хочешь может сделать. Её в деревне все очень любят. Она много знает. Она даже умеет лечить. У одного нашего соседа очень болела голова. И лекарства ему не помогали. А твоя бабушка быстро вылечила его, травами.
—А что она ещё умеет делать? — спросил с интересом Вовка.
—Всё,— ответил Витя.—Она знает все деревья в лесу и все травы. А ещё она всегда знает, что человек думает.
—Это правда,— сказал Вовка.— Она всегда знает, что я думаю.
Вовка видел, что бабушка всё умела делать, что она много работала дома и в поле. Однажды они вместе пошли в лес. В лесу она была, как у себя дома: каждая трава, каждое дерево были ей знакомы.
Бабушка показала Вовке разные травы: вот эта трава хорошо лечит, если голова болит, а вот эта, если сердце болит.
—А откуда ты всё это знаешь? — спросил Вовка.
—Я всю жизнь в деревне живу, моя мать хорошо знала травы и мне всё рассказала.
—Бабушка, а как ты одного человека вылечила?—решил спросить Вовка.
—Какого человека?
—Из вашей деревни, у которого голова очень болела и которому лекарства не помогали.
—Я уже и забыла о нём,— сказала бабушка.— Как вылечила? Видишь, я знаю травы, которые помогают, когда голова болит.
—А почему ему лекарства не помогли?
—Потому что он не верил, что может выздороветь.
—А тебе поверил?
—Да, я дала ему траву и сказала, что через три дня он будет здоров. Важно, что он поверил мне.
Теперь бабушка нравилась Вовке. Она рассказывала интересные истории. Вовка видел, что бабушка много знает. Он теперь с удовольствием делал всё, что просила бабушка, он хотел помочь ей. Ему нравилось, что бабушка не жалела его, как маленького, а хотела, чтобы он всё делал, как большой. Лето кончилось, пришла телеграмма из Мурманска. Бабушка прочитала её и сказала: «Ну, радуйся».
—Отец едет?
—Не едет, а ты должен ехать.
—Почему? — спросил Вовка.
—Потому что он отец, и хочет, чтобы ты приехал.
—А как же ты будешь жить? Одна?
—Если захочешь — приедешь ко мне опять, а если не захочешь — значит, плохая у тебя бабушка.
Вовка хотел сказать бабушке, что очень любит её, но не мог. Он стоял и плакал.
[Источник: Костомаров В. Г. «Русский язык для всех» Давайте поговорим и почитаем 4-е изд., Русский язык, Москва, 1990. с. 262]
दादी और उसका पोता वोफ्का (अ0 अक्स्योनोवा)
पहले वोफ्का, उसकी माँ और पिता उत्तर में, मुरमानस्क में रहते थे। पर तीन साल पहले उसकी माँ बीमार पड़ी और चल बसी। उसके पिता जो कि एक जहाज में कप्तान थे, अक्सर समुद्र में हुआ करते थे और शुरूआत में तो एक पड़ोसन वोफ्का को अपने घर ले जाती थी। पर बाद में, उसके पिता ने उसे छुट्टियों में उसको उसकी दादी के पास गाँव में भेजने की सोची।
शुरूआत में उसको उसकी दादी पसंद नहीं आयी। वोफ्का को आदत पड़ चुकी थी, कि उसके सभी दोस्त और जानने वाले उससे हमदर्दी दिखायें। पर दादी ने ऐसा कुछ भी नहीं किया।
पहले ही दिन, अपने पिताजी के जाने के बाद ही, वोफ्का ने अपनी टाँग तुड़वा ली। उसके पैर में बहुत दर्द था और वह बहुत देर तक जोर-जोर से रोता रहा। पर दादी ने बहुत शान्त तरीके से उसको कहा- ‘‘रोओ मत! तुम अब छोटे बच्चे नहीं रहे!‘‘ और बाद में उसे दुकान से डबल रोटी लाने के लिये भेज दिया। और वोफ्का चला गया।
वह डबल रोटी लाया और मेज पर फेंक दी।
‘‘ये रहीं डबल रोटी आपके लिये।’’
‘‘तुम ये क्या? तुम कैसे बात कर रहे हो?’’ -दादी ने गुस्से से बोला।
वोफ्का चुप रहा। वह बोला कि उसका रात के खाना खाने का मन नहीं है और सोचता रहा कि दादी उससे पूछेंगी, क्यों? और उसे जरूर ही खाने के लिये देंगी। लेकिन दादी ने ऐसा कुछ भी नहीं पूछा और न ही उसको रात का खाना परोसा। सुबह वोफ्का को पानी भरना पड़ता था, दुकान से डबल रोटी खरीदनी पड़ती थी और बाद में खेतों में दादी के साथ हाथ बटाँना पड़ता था। वोफ्का को ये सब बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा था। और एक बार उसने अपनी दादी कहा- ‘‘पिताजी को ख़त लिख दीजिये ताकि वो यहाँ आये और मुझे यहाँ ले जायें।‘‘
‘‘कोई बात नहीं, तुम्हें आदत पड़ जायेगी’’ -दादी ने जवाब दिया।
‘‘मैं सब पिताजी को बताऊँगा। मुझे ही क्यों यहाँ पर हर वक्त काम करना पड़ता है? मेरी अभी छुट्टियाँ चल रही हैं और मुझे आराम करना चाहिये, पर मैं यहाँ पूरे दिन काम ही करता रहता हूँ।’’
‘‘दूसरे भी तो काम करते हैं और तुम भी कोई छोटे बच्चे नहीं हो।’’
‘‘मैं तो अभी केवल दूसरी कक्षा में ही पढ़ता हूँ! मैं केवल नौ ही साल का हूँ।’’
‘‘ये ही तो मैं कह रही हूँ, कि तुम अब बड़े हो ही चुके है। जब मैं नौ साल की थी, मैं उससे पहले ही खेतों में काम करती थी।’’
तब वोफ्का ने सब कुछ उल्टा-पुल्टा करने की ठान ली। उसने सोचा कि यदि वह सब कुछ गन्दे तरीके से करेगा तो दादी उसे कुछ भी काम करने के लिए कहेगी ही नहीं? एक दिन वह दुकान में नहीं गया, शाम को दादी ने बोला- ‘‘आज हम लोग रात का खाना नहीं खायेगें क्योंकि हमारे पास डबल रोटी नहीं है।‘‘ वोफ्का भूखा ही सोने चला गया। ‘‘और इन सब से तुम्हें कुछ भी हासिल नहीं होगा।’’ -दादी ने उसे कहा, जो कि सब कुछ समझ चुकी थी। ‘‘तुम यहीं पर रहोगे और काम करने की आदत भी डालोगे। और तुम्हारी दादी तुम्हें पसन्द भी आयेगी।‘‘
वोफ्का ने गुस्से से दादी की तरफ देखा, लेकिन कुछ नहीं बोला।
अगले दिन वोफ्का ने दादी के बारे में अपने मित्र विच्या को बताया। लेकिन विच्या उससे बोला-
‘‘तुम अभी तक उन्हें नहीं जानते, वह जो चाहती है वो कर भी सकती है। गाँव में उन्हें सब बहुत पसंद करते हैं। वह बहुत कुछ जानती है। यहाँ तक कि वह इलाज करना भी जानती है। हमारे एक पड़ौसी का सिर बहुत दर्द कर रहा था। और कोई भी दवाई फायदा नहीं कर रही थी। लेकिन तुम्हारी दादी ने बहुत जल्दी ही इलाज ठीक कर दिया, वो भी जड़ी-बूटियों से।’’
‘‘वह और भी क्या-क्या कर सकती है?’’- वोफ्का ने दिलचस्पी से पूछा।
‘‘सभी कुछ’’, विच्या ने उत्तर दिया। ‘‘वह जंगल में सभी पेड़ व सभी जड़ी-बूटियों को जानती है। और वह यह भी जानती है कि सामने वाला आदमी क्या सोच रहा है?’’
‘‘ये बिल्कुल सच है।’’, वोफ्का ने कहा। ‘‘उन्हें हमेशा पता होता है कि मैं क्या सोचता हूँ।’’
वोफ्का ने देखा कि दादी सब कुछ कर सकती थी। वह घर पर और खेत में बहुत काम करती थी। एक बार वे जंगल में साथ-साथ गये। वह जंगल में ऐसे ही घूम रही थी जैसे अपने घर में हो। हर घास हर पेड़ को वह जानती थी।
दादी ने वोफ्का को अलग-अलग प्रकार की घास दिखाई। ‘‘ये घास सिर दर्द के लिए बहुत अच्छी है और ये अगर सीने में दर्द हो तब।’’
‘‘और तुम ये सब कैसे जानती हो?’’ -वोफ्का ने पूछा।
‘‘मैं पूरे जीवन गाँव में ही रही हूँ। मेरी माँ बहुत सारी जड़ी-बूटियों के बारे में जानती थी और मुझे सब बताती रहती थी।’’
‘‘और दादी कैसे तुमने उस आदमी को ठीक किया था?’’ -वोफ्का ने पूछने की ठान ली।
‘‘कौन सा आदमी?’’
‘‘आपके गाँव जिसका सिर बहुत दर्द कर रहा था और कोई दवाई भी फायदा नहीं कर रही थी।’’
‘‘मैं तो उसके बारे में भूल ही गई थी, मैंने कैसे उसका इलाज किया था?‘‘ -दादी ने कहा। तुम समझ रहे हो, मैं उन कुछ जड़ी-बूटियों के बारे में जानती हूँ, जो बहुत फायदा करती हैं, अगर सिर दर्द हो रहा हो।
‘‘और उससे पहले दवाईयाँ क्यों काम नहीं कर रही थी?’’
‘‘क्योंकि उसे भरोसा ही नहीं था, कि वह कभी ठीक भी हो सकता है।’’
‘‘और उसे तुम पर भरोसा था?’’
‘‘हाँ, मैंने उसे जड़ी-बूटी दी और बोली कि तीन दिन के अन्दर-अन्दर वह ठीक हो जायेगा। ये जरूरी था कि वह मुझ पर भरोसा करे।’’
अब वोफ्का दादी को पसंद करने लगा था। वह उसे बहुत मजेदार घटनाओं के बारे में बताती रहती थी। वोफ्का को यह बात धीरे-धीरे समझ में आ रही थी कि उसकी दादी बहुत कुछ जानती है। अब वोफ्का न केवल खुशी-खुशी से वह सभी काम करने लगा जो दादी उसे करने के लिए कहती थी, इसके अलावा अब वह उनकी मदद भी करना चाहता था। उसे यह बात बहुत अच्छी लगी, कि दादी ने उसे छोटे बच्चे की तरह हमदर्दी नहीं जतायी पर वह चाहती थी कि वह अपनी जिम्मेदारी का एहसास कर सभी काम करे। गर्मी की छुट्टियाँ खत्म होने लगी। मुरमानस्क से तार आया। दादी ने उसे पढ़ा और बोली- “अरे वाह! खुश हो जाओ”।
‘‘पिताजी आ रहे हैं?’’
‘‘वो नहीं आ रहे हैं बल्कि तुम्हें जाना है।’’
‘‘ऐसा क्यों?’’ -वोफ्का ने पूछा।
‘‘क्योंकि वह तुम्हारे पिता हैं, और वह चाहते हैं, कि तुम खुद वहाँ पहुँचो।’’
‘‘और तुम यहाँ पर कैसे रहोगी? वो भी अकेली?’’
‘‘अगर कभी मन करे तो तुम मेरे पास दोबारा आ जाना, और अगर मन नहीं करे -इसका मतलब है कि तुम्हारी दादी अच्छी नहीं है।’’
वोफ्का दादी से कहना चाहता था कि वह उसे बहुत प्यार करता है लेकिन कुछ कह न सका। बस खड़ा हुआ रोता ही रहा।
(स्त्रोत - यह कहानी व0ग0 कस्तमारोव ‘‘रूस्की याज़िक द्ल्या फ्स्येख - दवाइत्ये पगवारिम ई पचितायेम‘‘, (चतुर्थ संस्करण), रूस्की याज़िक प्रकाशन, मास्को, 1990, पृष्ठ संख्या -262 से उद्धृत है।)

इस अनुवाद कार्य को पूर्ण करने हेतु प्राप्त सहयोग ने मुझे न केवल उत्कृष्ट कार्य के लिए प्रेरित किया वरन् अनुवादन को भी और अधिक रूचिकर बनाया। इस अनुवाद कार्य में मेरा निर्देशन श्री एस0 के0 दत्ता (विभागाध्यक्ष, रूसी भाषा विभाग, चौ0 चरण सिंह विवि0, मेरठ) के द्वारा किया गया, जिनके सानिध्य व मार्गदर्शन ने मुझे अमूल्य सहयोग प्रदान किया। आपके अविस्मरणीय सहयोग के लिए मैं आपका आभार व्यक्त करती हूँ।
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