Маша – мамаша (Ю. Пшёнкин)
–Смейтесь не смейтесь, но я вам скажу, что умнее нашего камчатского медведя никого нет, - начал новый рассказ Лука Самсонович.
–Однажды к нашей палатке геологов стал медведь приходить. Ходит и ходит и не кричит. Подойдёт и совсем как человек плачет. Мы и из ружья стреляли, чтобы он в лес ушёл, а он всё стоит. Вот я и говорю товарищам :
– Тут что-то не так. Надо посмотреть, что случилось.
Сначала меня никто слушать не хотел, но потом согласились. Подождали мы, когда медведь опять пришёл, взяли ружьё и – к нему. А медведь посмотрел на нас и пошёл в лес к горам. Можно было подумать, что он ждёт нас и дорогу хочет показать. Идёт он впереди, но всё время на нас смотрит, идём мы или не идём. Так прошли мы километра четыре. Вдруг медведь остановился и в одном месте стал землю рыть. Тогда я говорю :
–Вы, ребята, здесь с ружьём стойте, а я посмотрю, что это там медведь в земле ищет.
–Товарищи ружья приготовили, а я пошёл. Смотрю, медведь немного отошёл назад и остановился. Не знаю почему, но я его не боялся. Подошёл к месту, где он рыл, смотрю – а там яма глубокая, а в яме – медвежонок. Вот оно что! Так это медведица! Стоит мамаша и на меня смотрит.
Я к ребятам вернулся, рассказал, что и как. Приготовили мы верёвку, и я в яму стал спускаться. Взял медвежонка и – наверх.
Посмотрели мы, а медвежонок – такой слабый, что и на ногах не стоит. Да, наверное, не один день в этой яме сидел.
Что же делать? Оставить медвежонка с мамашей – погибнет: очень уж слабый. Решили мы взять его с собой. Взяли его и пошли, а сами всё на мамашу смотрим. Но она, вот умная, рядом идёт.
Принесли мы медвежонка к палатке и дали ему молока. А медведица рядом ходит и, вы только подумайте, не кричит. Жил у нас медвежонок не долго.
Потом ребята его на лодке на другой берег перевезли. А медведица сама через реку плыла и на сына своего смотрела. На том берегу и встретились мать с сыном, встретились совсем как люди. Как он играл около неё, как она его обнимала! Поиграли они – и пошли в лес.
[Источник: Катаева М.Б. и др. «Читаем о России по-русски». Хрестоматия. - 4-е изд., «Златоуст», СПб., 2002, с. 21]
माशा- माँ (यू0 प्श्योनकिन)
‘‘आप मुझ पर हंस सकते हैं पर मैं आपको कहना चाहता हूँ कि हमारे कमचात्का के भालूओं से बुद्धिमान कोई नही है।’’ -यही कहते हुये लूका समसोनोविच ने नई कहानी शुरू की।
एक बार हमारे भूवैज्ञानिकों के तम्बू के पास एक भालू अक्सर आने लगा। वह तम्बू के चारों ओर घूमता ही रहता था, पर कभी चिल्लाता नहीं था। वह पास आता था और बिल्कुल एक आदमी की तरह ही रोता था। हम बन्दूक चलाते थे ताकि वह जंगल में चला जाये। फिर भी वह वहीं खड़ा रहता था। और तब मैंने अपने दोस्तों को कहा-
‘‘यहाँ पर बात कुछ और ही है। हमें देखना चाहिये कि हुआ क्या है?’’
पहले तो मेरी बात किसी ने नहीं सुनी और ना ही सुनना चाहा पर धीरे-धीरे वे इस बात पर राजी हो गये। हम इन्तजार करते रहे और जब भालू दोबारा आया, हमने बन्दूक उठा ली और उसकी तरफ लपक पड़े। भालू ने हमारी तरफ देखा और जंगल की तरफ पहाड़ियों की तरफ चल पड़ा। ऐसा मानो कि वह हमारा इन्तजार ही कर रहा था और हमें रास्ता भी दिखाना चाह रहा था। वह आगे-आगे चल रहा था, पर बार-बार मुड़कर हमारी तरफ भी देख रहा था कि हम पीछे-पीछे आ रहे हैं या नहीं। हम लगभग चार किमी0 पार कर चुके थे। अचानक वह रूक गया और एक जगह पर जमीन को खोदने लगा। तब मैंने कहा-
‘‘दोस्तों, आप यहाँ पर बन्दूक लिए हुए खड़े रहिये और मैं जाकर देखता हूँ कि वहाँ भालू जमीन में ढूँढ़ क्या रहा है?’’
सभी दोस्त अपनी-अपनी बन्दूकें तान कर खड़े हो गये और मैं आगे बढ़ा। तब मैंने देखा कि भालू मुझे देखकर थोड़ा पीछे हट गया और रूक गया। मैं नहीं जानता क्यों? पर मुझे उससे बिलकुल भी डर नहीं लग रहा था। मैं उस जगह तक बढ़ा जहाँ वह जमीन खोद रहा था और तब मैंने देखा कि वहाँ एक गहरा गड्ढ़ा और उस गड्ढ़े में एक भालू का बच्चा। ओह, तो ये बात है! ये तो मादा भालू है! माँ खड़ी थी और मेरी ओर देख रही थी।
मैं दोस्तों के पास वापस गया और उन्हें बताया कि वहाँ हुआ क्या था? हमने एक रस्सी तैयार की और मैं गड्ढ़े में उतरने लगा। और फिर मैं भालू के बच्चे को उठाकर ऊपर की तरफ आया।
हमने देखा कि भालू का बच्चा इतना कमजोर था कि वह अपने पैरों पर भी खड़ा नहीं हो पा रहा था। और हाँ, शायद वह कई दिनों से उस गड्ढ़े में गिरा हुआ था।
तो क्या करें? अगर बच्चे को माँ के साथ छोड़ दें तो वह मर ही जायेगा क्योंकि वह बहुत ही कमजोर था। तब हमने फैसला किया कि उसको अपने साथ ले चलें। हमने उसे उठाया और चल पड़े और हर समय हम उसकी माँ की तरफ देखते रहे। लेकिन वह बहुत ही अक्लमंद थी। वह भी हमारे साथ-साथ ही चलती रही।
हम भालू के बच्चे को तम्बू तक ले आये और उसे थोड़ा सा दूध दिया। और वह मादा भालू के पास ही घूमती रही। पर जरा सोचिये! वह चिल्ला भी नहीं रही थी। भालू का बच्चा हमारे पास बहुत ज्यादा समय तक नहीं रहा। उसके बाद दोस्त लोग उसे नाव में दूसरे किनारे पर छोड़ने गये। और मादा भालू जो खुद तैरकर नदी पार कर रही थी, अपने बेटे की तरफ देखती रही। उस किनारे पर माँ और बेटे मिले और वे बिल्कुल ही हम इंसान जैसे मिले रहे थे। और वह कितनी खुशी से अपनी माँ के पास खेल रहा था और वह कैसे उसको गले लगा रही थी! कुछ देर तक वे खेलते रहे- और फिर जंगल की तरफ चले गये।
(स्त्रोत- यह कहानी एम0बी0 काताएवा एंव अन्य, ‘‘चितायम अ रसी पो-रूस्की‘‘ खरेसतोमातिया (चतुर्थ संस्करण) सैण्टपिट्सबर्ग ‘‘जलातोउस्त‘‘, 2002, पृष्ठ संख्या 21 से उद्धृत है।)

इस अनुवाद कार्य को पूर्ण करने हेतु प्राप्त सहयोग ने मुझे न केवल उत्कृष्ट कार्य के लिए प्रेरित किया वरन् अनुवादन को भी और अधिक रूचिकर बनाया। इस अनुवाद कार्य में मेरा निर्देशन श्री एस0 के0 दत्ता (विभागाध्यक्ष, रूसी भाषा विभाग, चौ0 चरण सिंह विवि0, मेरठ) के द्वारा किया गया, जिनके सानिध्य व मार्गदर्शन ने मुझे अमूल्य सहयोग प्रदान किया। आपके अविस्मरणीय सहयोग के लिए मैं आपका आभार व्यक्त करती हूँ।
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