Anubhuti





Saturday, August 6, 2011

Дальний родственник (А. Алексин) दूर के रिश्तेदार (अ0 अल्येकसिन)



Дальний родственник  (А. Алексин)
        
Если телефон звонит ночью, это почти всегда очень плохо: чтобы сообщить что-нибудь хорошее, можно подождать до утра!
Когда папе звонят ночью из больницы, я сразу понимаю, что кому-то из папиных больных плохо. Ну, а когда папа быстро одевается, забывая надеть пиджак или галстук, и уезжает, тогда и мы с мамой не спим до утра. Но иногда ночью раздаются то очень длинные звонки, то очень короткие. Это из других городов: бывшие папины пациенты или его бывшие друзья по институту. Папа разговаривает с ними так, как будто у нас дома ещё не ложились спать.
Мама удивляется, а папа объясняет:
—Они знают, что в это время человек обычно бывает дома. Разве можно их осуждать?
Иногда во время таких звонков выясняется, что папин знакомый хочет приехать в наш город.
—Вот и хорошо,—говорит в таких случаях папа.— Прямо с вокзала — к нам!
—Странные люди!—замечает мама.—Хотя бы для виду отказались. Ведь есть же гостиницы...
—Но ведь каждому хочется побыть -среди близких людей.
Бабушка на следующий день начинает воспитывать папу. Но делает это, как обычно, по-своему.
—Муж моей соседки,—говорит она,— никогда ничего не решает без жены. И папа должен понять, что он тоже должен всегда советоваться с мамой. 
Однажды ночью опять раздались длинные звонки и через минуту папа уже говорил в трубку:
—Ну что за вопрос?! Пусть приезжает. Остановится у нас. Я покажу его специалистам. Устроим консилиум, если будет нужно.
А положив трубку, объяснил маме:
—У её сына что-то очень серьёзное...
—А что, у них в городе нет врачей?
—Это маленький городок. Там нет крупных специалистов.
—Обязательно нужны крупные?
—Вот если бы он заболел,—папа показал на меня,— ты бы тоже плакала в трубку: «Посмотрите моего мальчика!» Разве её можно осуждать?
Мама ничего не сказала. Утром она спросила:
—А кто эта женщина... которая звонила тебе?
—Дальняя родственница.
—Очень дальняя?
—Кажется, очень. Но какое это имеет значение, если её мальчик серьёзно болен?
«Мальчик» приехал через три дня.
Это был мужчина лет тридцати.
—Извините меня, пожалуйста,— сказал он.—Я никогда бы не приехал к вам, если бы врачи не сказали матери про этот свой «предполагаемый диагноз». Теперь она не будет ни спать, ни есть.
—А что у вас... предполагают?—спросила мама.— Какую болезнь?
—Ту самую,— ответил наш дальний родственник, которого звали Игнатий.
—Какую... ту самую? —не поняла мама.
—Ну, которая неизвестно от чего начинается, зато известно, чем обычно кончается.
—Почему? —сказала бабушка.—В этой области много открытий!
—Да, конечно! —громко сказал папа, хотя всегда говорит тихо. А когда бабушка начинала говорить о медицине, всегда уходил покурить в коридор. Сейчас он остался в комнате.
Бабушка никогда не болела, но очень боялась, что кто-нибудь из её близких родственников заболеет. Она очень любила читать «Советы врача», которые печатались в разных газетах. Игнатию она сказала:
—Вы совсем не похожи на больного той болезнью, которую у вас предпо­лагают. Трое моих знакомых были больны этим самым. Им сделали опера­цию, и всё замечательно!
—А откуда вы знаете о «предполагаемом диагнозе»? — спросил папа.
—Врачи как-то заволновались, стали говорить, что нет ничего серьёзного, хотя я-то не волновался. Но потом они зачём-то сказали матери. Вот тут я рассердился. Зачем было ей говорить?
—Они были правы,— сказал папа.— Они должны сообщать родственникам.
—Но они же не родственникам сообщили, а матери! —сказал Игнатий.—Поэтому я и приехал, чтобы успокоить её. Понимаете? Мама одна воспиты­вала меня... без отца. Ей было очень трудно. И мы всё считали: «Ещё два года в школе, потом пять лет в институте. Всего семь!» Наконец я институт окончил, начал работать, и вдруг эта болезнь. Разве это возможно? Мать ждала столько лет. Наконец дождалась,—а я ей такой подарок! Она вся почернела. Скорей бы дать телеграмму: «Всё в порядке. Скоро буду дома». На следующий день рано утром папа и Игнатий поехали в какой-то инсти­тут, а оттуда к папе в больницу.
—Вечером вы узнаете о результатах,— сказал нам папа.
—Нет, позвони мне на работу,—сказала мама.— Если я выйду из комнаты, передай: «Всё хорошо!»
—Или: «Всё плохо!»—бодро сказал Игнатий.
—Этого не будет!—сказала мама.— Я уверена... Игнатий всё время улыбался — я понял, что он волнуется.
—Мне тоже сообщите, пожалуйста,— попросил я. Папа обещал. Бабушка обычно приходила помогать маме по вечерам. А тут пришла днём. Дома у бабушки телефона нет. И поэтому по вечерам, когда она приходит помогать маме, у нас всё время занят телефон. Но в тот день бабушка никому не звонила. Она ждала. И я ждал.
Наконец мы дождались: позвонил папа. Бабушка повторяла мне каждую папину фразу:
—Этого у Игнатия нет. Точно установили. Он болен серьёзно. Надо делать сложную операцию. Но этого нет!
—Слава богу,—сказала бабушка. Пошла в комнату и легла на диван. Вид у неё был очень усталый. И я тоже как-то сразу устал.
Но когда через полчаса раздались длинные звонки, я бросился к телефону.
—Это городок, где живёт Игнатий,—сообщил я бабушке.— Просили не класть трубку и ждать. Я первый скажу его матери... Первый!
—А сын моей соседки всегда уступает старшим.
Я должен был понять, что трубку нужно отдать бабушке. Но я не отдал, а бабушка с дивана не встала, а только стала внимательно слушать.
—Он будет жив и здоров! — крикнул я в трубку.— Этого у него нет. Точно установили! Этого нет.
Мать Игнатия заплакала на другом конце провода. Тогда я радостно закричал:
—Он серьёзно болен! Ему будут делать сложную операцию! Но этого нет. Не волнуйтесь! Он будет жив и здоров!
В школе мы часто пишем сочинения на тему «Кем быть?» Один раз я написал, что космонавтом, но на самом деле я ещё не выбрал профессии. И в тот день я не знал, кем хочу стать. «Но как это хорошо,— думал я,— выйти из операционной, устало улыбнуться и сказать: «Он будет жив ... и здоров. Не волнуйтесь. Он будет жив!»


[Источник: Костомаров В. Г. «Русский язык для всех» Давайте поговорим и почитаем 4-е изд., Русский язык, Москва,  1990, c. 300]



 दूर के रिश्तेदार (अ0 अल्येकसिन) 

यदि रात को टेलीफोन की घण्टी बजती है, तो ये ज्यादातर कुछ बहुत बुरे की सूचना देती है क्योंकि अगर कोई अच्छी सूचना हो तो सुबह तक का इंतजार किया जा सकता है।
जब पापा के लिए अस्पताल से रात को फोन आता है, मैं तुरन्त ही समझ जाता हूँ कि पापा के किसी मरीज की हालत खराब है। और अगर फोन मिलते ही पापा जल्दी-जल्दी कपड़े पहनने लगते हैं और कोट व टाई पहनना भूलते हुये निकल पडते है, तब तो माँ और मुझे सुबह तक नींद ही नहीं आती है। पर कभी-कभी रात में, या तो लम्बी-लम्बी घण्टियाँ बजती हैं या फिर छोटी-छोटी सुनायी देती है। सुनते ही पता चल जाता है कि यह दूसरे शहर से कोई फोन है। या तो पापा का कोई पुराना मरीज होगा या उनके कॉलिज के दिनों के पुराने दोस्त। और पापा उनसे ऐसे तरह बात करने लगते हैं कि मानो हमारे घर में अभी तक कोई सोने न गया हो।
माँ हैरान हो जाती है पर पापा उन्हें समझाते हैं-
‘‘वे जानते हैं कि आमतौर पर इस समय कोई आदमी घर पर ही होता है। क्या उनको गलत ठहराना उचित होगा?’’
कभी-कभी इस प्रकार के टेलीफोन की घण्टियों से पता चलता है कि पापा के कोई जानकार हमारे शहर आना चाहते हैं।
‘‘अरे ये तो बहुत बढ़िया है!’’ -पापा इस तरह की परिस्थितियों में कहते है। ‘‘बस स्टेशन से सीधे हमारे पास आ जाना।’’
‘‘अजीब लोग हैं!’’ -माँ टोंट कसते हुए कहती है। ‘‘वे दिखावे के लिए तो एक बार मना ही कर सकते हैं। आखिरकार इस शहर में बहुत सारे होटल भी तो हैं।’’
‘‘पर सबका मन भी तो करता है अपनो के बीच में रहने का।’’ और अगले ही दिन नानी पापा को उपदेश देना शुरू करती है। पर करती हैं अपने अनोखे अंदाज से ही।
वह बोलती हैं- ‘‘मेरी पड़ोसन का पति कभी भी कुछ भी अपनी पत्नी के बिना सलाह मशवरे के कोई काम करने का फैसला नही करता।’’ और पापा को भी ये समझना चाहिये कि वह भी हमेशा माँ से सलाह-मशवरा करते रहें।
और एक दिन रात में अचानक वैसी ही लम्बी घण्टियाँ बजने लगी। और एक मिनट के बाद ही पापा ने टेलीफोन पर कहना शुरू कर दिया था-
‘‘ये कौन सी बात हुई। उसको आने दो। वो हमारे ही पास रूकेगा। मैं उसको विशेषज्ञों को दिखाऊंगा। और यदि जरूरत पड़ती है तो हम विशेषज्ञों के पैनल की मदद लेंगे।’’ 
और फोन रखते ही माँ को समझाया-
‘‘उसके बेटे की हालत कुछ ज्यादा ही गम्भीर है।’’
‘‘क्या है? उनके शहर में कोई डाक्टर नहीं है क्या?’’
‘‘वह बहुत ही छोटा शहर है। वहाँ पर कोई बड़े विशेषज्ञ भी नहीं है।’’
‘‘क्या हरदम विशेषज्ञों की जरूरत होती है?’’
तब पापा मेरी तरफ इशारा करते हुए बोले- ‘‘अगर ये बीमार हो जाता है तो तुम भी ऐसी ही फोन पर रोने लगती, “मेरे बच्चे को देख लीजिये।” इस बात के लिए उसको थोड़े ही गलत ठहराया जा सकता है?’’
 माँ कुछ भी नहीं बोली और सुबह पूछा-
‘‘और ये औरत कौन है? .......................... जिसने तुम्हें फोन किया था?’’
‘‘दूर की रिश्तेदार है।’’
‘‘क्या बहुत दूर की है?’’
‘‘लग तो रहा है बहुत दूर की। पर इस चीज से इसका क्या लेना-देना है अगर उसका बच्चा गम्भीर रूप से बीमार है?’’
“बच्चा” तीन दिन के बाद पहुँचा।
वह तीस साल का एक आदमी था।
‘‘परेशान करने के लिए माँफी चाहता हूँ।’’ -उसने बोला। ‘‘मैं आप के पास कभी नहीं आता, अगर डॉक्टरों ने माँ को अपने ‘‘उस शक’’ के बारे में न बताया होता। अब तो वह न तो सो पा रही हैं और न ही खाना खा पा रही हैं।’’

‘‘और आपको क्या हुआ है?................. क्या अंदाजा लगा रहे हैं?’’ -माँ ने पूछा। ‘‘कौन सी बीमारी है?’’
‘‘बिल्कुल वही’’- हमारे दूर के रिश्तेदार ने जवाब दिया। थोड़ी देर में पता चला कि उसका नाम इगनाती था।
‘‘कौन सी वही’’ के बारे में आप बात कर रहे हैं?- माँ नहीं समझी।
‘‘बिलकुल वही’’ जो पता नहीं लगता कि किस चीज से शुरू होती है पर सभी को यह मालूम है कि कैसी स्थिति में खत्म होती है। 
‘‘क्यों?’’ -दादी ने पूछा। ‘‘इस विषय में तो बहुत सारी खोज हो चुकी हैं।’’
‘‘हाँ, जरूर हुई है।’’ -पापा ने चिल्लाते हुए कहा। हालाँकि वह हमेशा शान्त तरीके से बात करते थे और जब भी नानी डॉक्टरी के बारे में बात करना शुरू कर देती हैं तो पापा सिगरेट पीने के लिए बाहर चले जाते हैं। पर इस बार पापा कमरे में ही रूके रहे। 
नानी कभी बीमार नहीं पड़ती थी, पर हमेशा उनको डर लगा रहता था कि उनके नजदीकी रिश्तेदारों में से कोई कभी बीमार न पड़ जाये।  वह विभिन्न अखबारों में ‘‘डॉक्टर की सलाह’’ पढ़ना बहुत पसन्द करती थी। वह इगनाती को बोलने लगी- 
‘‘भले ही अंदाजा लगाया जा रहा है पर आप तो बिलकुल भी ‘‘उस बीमारी’’ से पीड़ित नहीं लग रहे हैं। मेरे तीन जानकार इसी बीमारी से ही पीड़ित थे। उन्होंने अपना ऑपरेशन करवाया और अब तो सब कुछ ठीक-ठाक ही चल रहा है।’’
‘‘आप “अनुमित निदान” के बारे में ये सब कहाँ से और कैसे जानते है?’’ -पापा पूछ बैठे।
‘‘पता नहीं कैसे सभी डाक्टर बहुत ज्यादा घबरा गये थे, और बोलने लगे कि मुझे कोई गम्भीर बीमारी नहीं है। पर मैं तो बिलकुल घबराया हुआ नहीं था, पर पता नहीं उन्होंने बाद में माँ को ये सब कुछ क्यों  बताया? और तभी मुझे बहुत गुस्सा आया। उन्हें बताने की जरूरत ही क्या थी?’’
‘‘वे बिलकुल ही सही थे।’’ -पापा ने कहा। ‘‘उनको करीबी रिश्तेदारों को बताना जरूरी होता है।’’

‘‘लेकिन उन्होंने तो किसी करीबी रिश्तेदार को नहीं, पर माँ को बताया।’’ -इगनाती ने कहा। ‘‘इसलिये ही तो मैं यहाँ पर आया ताकि उन्हें चैन मिल सके। आप समझ रहे हैं माँ ने अकेले ही मुझे बड़ा किया..........वो भी पापा के बिना। यह सबकुछ उनके लिए बहुत ही मुश्किल था। और हम तो हिसाब ही लगाते रह गये “दो साल स्कूल में, उसके बाद पाँच साल कॉलेज में। कुल मिलाके सात साल। आखिर में, मैंने कॉलेज की पढ़ाई पूरी की, नौकरी भी करना शुरू कर दिया और अचानक ये बीमारी। ऐसा होना चाहिये क्या? माँ ने कितने साल इन्तजार किया। और आस ही लगाती रह गयी। और आखिर में मेरा ये तोहफा! चिन्ता के कारण उनका चेहरा काला पड़ गया है। जल्द ही मुझे उनको टेलीग्राम भेजना चाहिये ‘‘सब कुछ ठीक है। जल्द ही घर पहुँचूंगा।’’ अगले दिन, सुबह ही पापा और इगनाती किसी संस्थान की ओर निकल पड़े और वहाँ से पापा के अस्पताल में।
‘‘शाम को आपको नतीजों के बारे में पता लग जायेगा।’’ -पापा ने हमें बताया।
‘‘नहीं, मुझे ऑफिस में ही फोन कर बता देना’’ -माँ ने कहा। ‘‘यदि मैं किसी काम से अपने कमरे में नहीं होऊँगी तो बता देना ‘‘सब ठीक है’’।’’
‘‘या सब ठीक नहीं है।’’ -इगनाती ने साहस जुटाते हुए कहा।
‘‘ऐसा नहीं होगा।’’ -माँ ने कहा। ‘‘मुझे विश्वास है.................’’
इगनाती सारे समय हँस रहा था। मैं समझ गया कि वह बहुत ही घबराया हुआ है। 
‘‘कृपया मुझे भी जरूर बताइयेगा’’, मैंने विनती की। पापा ने मुझे वादा किया।
आमतौर पर, नानी शाम को माँ का हाथ बटाने के लिये आती थी। और आज वह बिलकुल सुबह से ही आ चुकी थी। नानी के घर में टेलीफोन नहीं था और इसलिये शाम को जब वह माँ की मदद करने आती थी, तो हमारा टेलीफोन पूरे समय व्यस्त रहता था। लेकिन उस दिन नानी ने कोई भी फोन नहीं किया। वह इन्तजार ही करती रही। और मैं भी इन्तजार करता रहा।
आखिर में, हमारा इन्तजार खत्म हुआ। पापा ने फोन किया। नानी पापा के हर शब्द को मुझे दोहराती रही।
‘‘इगनाती को ‘‘वो बीमारी’’ नहीं है। बिलकुल सही जाँच पड़ताल किया गया। वह गम्भीर रूप से बीमार है। और एक बहुत ही मुश्किल ऑपरेशन की भी जरूरत है। लेकिन ‘‘वो बीमारी’’ नहीं है।’’

‘‘भगवान का बहुत-बहुत धन्यवाद!’’ -नानी ने कहा। और वह कमरे में गयी और सोफे पर पसर गयी।
चेहरे से वह बहुत थकी हुई लग रही थी। और पता नहीं कैसे मैं भी अचानक थक-सा गया था। लेकिन, जब आधे घण्टे के अन्दर लम्बी घण्टियाँ सुनायी दी, मैं टेलीफोन की तरफ लपक कर गया।
‘‘ये कॉल उस शहर से है जहाँ इगनाती रहता है।’’ -मैंने नानी को बताया। उन्होंने कहा कि रिसीवर मत रखिये और इन्तजार कीजिये। मैं सबसे पहले उसकी माँ को बताऊँगा............... पहले मैं।
‘‘और मेरी पड़ोसन का बेटा हमेशा बड़ों  को प्राथमिकता देता है।’’
मुझे भी समझना चाहिये था कि मुझे नानी को टेलीफोन दे देना चाहिये था। लेकिन मैंने उनको टेलीफोन नहीं दिया, और न ही नानी सोफे से उठी, पर हमारी बात बहुत ध्यान से सुनती रही। 
‘‘वह जीयेगा और अच्छा हो जायेगा।’’ -मैंने फोन पर चिल्लाते हुये कहा। ‘‘उसको वो बीमारी नहीं है। डाक्टरों  ने बिलकुल सही जाँच-पड़ताल किया। ‘‘वो बीमारी’’ नहीं है।’’
तार के दूसरी तरफ इगनाती की माँ रो रही थी। तब मैं खुशी से चिल्लाया।
‘‘वह गम्भीर रूप से बीमार है। उसे मुश्किल ऑपरेशन की आवश्यकता है। पर ‘‘वो बीमारी’’ नहीं है। घबराइये नहीं। वह ठीक हो जायेगा।’’
अक्सर हम स्कूल में ‘‘क्या बनोगे?’’ विषय पर निबन्ध लिखते हैं। एक बार मैंने लिखा था कि अन्तरिक्ष यात्री बनूँगा, पर वास्तव में मैंने जिदंगी में क्या बनूँगा तब तक यह कोई निर्णय नहीं लिया था। और उस दिन नहीं जानता था कि सही में मैं क्या बनना चाहता था। लेकिन कितना अच्छा होगा, मैं सोचता रहा- ऑपरेशन थियेटर से निकलना, थके हुये हंसना और बोलनाः “वह जीयेगा............... और ठीक भी हो जायेगा। घबराइये नहीं। वह जीयेगा!"



(स्त्रोत- यह कहानी व0ग0 कस्तमारोव ‘‘रूस्की याज़िक द्ल्या फ्स्येख - दवाइत्ये पगवारिम ई पचितायेम‘‘ए  (चतुर्थ संस्करण), रूस्की याज़िक प्रकाशन, मास्को, 1990, पृष्ठ संख्या-300 से उद्धृत है।)





1 comment:

  1. इस अनुवाद कार्य को पूर्ण करने हेतु प्राप्त सहयोग ने मुझे न केवल उत्कृष्ट कार्य के लिए प्रेरित किया वरन् अनुवादन को भी और अधिक रूचिकर बनाया। इस अनुवाद कार्य में मेरा निर्देशन श्री एस0 के0 दत्ता (विभागाध्यक्ष, रूसी भाषा विभाग, चौ0 चरण सिंह विवि0, मेरठ) के द्वारा किया गया, जिनके सानिध्य व मार्गदर्शन ने मुझे अमूल्य सहयोग प्रदान किया। आपके अविस्मरणीय सहयोग के लिए मैं आपका आभार व्यक्त करती हूँ।

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