Anubhuti





Saturday, August 6, 2011

Мать माँ


Мать

Я начал писать рассказы очень давно. Все писатели получают письма от читателей. Получал письма и я. Об одном письме я хочу рассказать вам. Десять лет назад я написал рассказ о своём друге, который погиб в 1941 году. Скоро я получил письмо. Написала его Антонина Ивановна Бочарникова. Она писала: «В газете «Советская Россия» я прочитала ваш рассказ о друге. Потом увидела фамилию: В. Бочарников. Вы не Володя? Мой сын Володя родился в 1923 году, учился в школе. В 1941 году, когда началась война, он пошёл на фронт. Сначала я получала его письма. Они приходили не часто, но я понимала : война. А потом... потом письма перестали приходить... И теперь я ничего не знаю о своём сыне: погиб он или нет? Где погиб? Когда? Все эти годы я ждала его, думала, что он вернётся, и сейчас жду и буду ждать. Теперь вы понимаете, почему я спросила вас: вы не Володя?»
Я очень волновался, когда писал ответ в Белгород, где жила Антонина Ивановна. Я понимал, как она ждёт это письмо. В письме я написал, что я – другой человек, а не её сын.
Я рассказал ей о своей жизни и работе. Когда я писал, я думал, как грустно будет ей читать это письмо. Ведь Антонина Ивановна ждала письма, которое должен был написать её сын. Я написал: «Дорогая Антонина Ивановна», а потом подумал и написал ещё: «Дорогая мама».
Теперь у меня две матери. Антонина Ивановна часто пишет мне, рассказывает о своей жизни, а я отвечаю ей.


[Источник: Костомаров В. Г. «Русский язык для всех» Давайте поговорим и почитаем 4-е изд., Русский язык, Москва, 1990, c. 255]


 माँ


मैंने कहानियाँ लिखना बहुत पहले शुरू कर दिया था। सभी लेखकों को पाठकों से पत्र मिलते है। और मुझे भी पत्र मिलते थे। मैं ऐसे ही एक पत्र के बारे में आपको बताना चाहता हूँ। दस साल पहले मैंने अपने दोस्त के बारे में एक कहानी लिखी थी जो कि सन् 1941 में मारा गया था। जल्द ही मुझे एक खत मिला। कोई एक अन्तोनिना इवानवना बचारनिकोवा ने उस खत को लिखा था। उसने लिखा था- “सवियतस्काया रसिया” अखबार में मैंने आपके दोस्त के बारे में, आपने जो कहानी लिखी थी, उसे पढ़ा। और फिर मैंने आपकी पदवी देखी- व0 बोचारनिकोव। कहीं आप वोलोज्या तो नहीं हैं? मेरे बेटे वोलोज्या का जन्म सन् 1923 में हुआ था। स्कूल में पढ़ता था। सन् 1941 में, जब युद्ध शुरू हुआ, वह सीमा पर चला गया। शुरू में तो मुझे उसके ख़त मिलते थे। भले ही ख़त अक्सर नहीं आया करते थे, लेकिन मैं समझती थी कि युद्ध चल रहा है। और उसके बाद........ धीरे-धीरे ख़त भी आने बंद हो गये।......... और अब मैं अपने बेटे के बारे में कुछ भी नहीं जानती हूँ। ‘‘वो मारा गया या जिंदा है? कहाँ पर मारा गया? और कब?‘‘ इन सभी सालों तक मैं उसका इन्तजार कर रही थी। सोचती थी कि वह कभी न कभी लौटेगा और मैं अभी तक इन्तजार कर रही हूँ और करती भी रहूँगी। अब आप समझ पा रहे हैं कि क्यों मैंने आपसे पूछा, “आप वोलोज्या तो नहीं है?” मैं बहुत घबराया हुआ था, जब मैं उस ख़त का जवाब बेलगोरद में भेज रहा था जहाँ अन्तोनिना इवानवना रहती थी। मैं समझ रहा था कि वह किस प्रकार से इस ख़त के जवाब का इन्तजार कर रही होगी? उस ख़त में मैंने लिखा था कि मैं दूसरा कोई हूँ न कि उसका बेटा। 
मैंने उसे अपने बारे में और अपने काम के बारे में बताया। जब मैं ख़त लिख रहा था तब मैं यह सोच रहा था कि उसे इस ख़त को पढ़कर कितना दुःख होगा। आखिरकार, अन्तोनिना इवानवना उस ख़त का इन्तजार कर रही थी जो कि उसका बेटा उसको लिखता। मैंने लिखा था, ‘‘आदरणीया अन्तोनिना इवानवना‘‘ और बाद में सोचा और फिर लिखा, ‘‘प्रिय माँ’‘।
अब मेरी दो माँ हैं। अन्तोनिना इवानवना अक्सर मुझे ख़त लिखती है, अपने बारे में बताती रहती है और मैं भी उनको जवाब देता रहता हूँ।



(स्त्रोत - यह कहानी व0ग0 कस्तमारोव ‘‘रूस्की याज़िक द्ल्या फ्स्येख - दवाइत्ये पगवारिम ई पचितायेम‘‘ए  (चतुर्थ संस्करण), रूस्की याज़िक प्रकाशन, मास्को, 1990 पृष्ठ संख्या -255 से उद्धृत है।)





1 comment:

  1. इस अनुवाद कार्य को पूर्ण करने हेतु प्राप्त सहयोग ने मुझे न केवल उत्कृष्ट कार्य के लिए प्रेरित किया वरन् अनुवादन को भी और अधिक रूचिकर बनाया। इस अनुवाद कार्य में मेरा निर्देशन श्री एस0 के0 दत्ता (विभागाध्यक्ष, रूसी भाषा विभाग, चौ0 चरण सिंह विवि0, मेरठ) के द्वारा किया गया, जिनके सानिध्य व मार्गदर्शन ने मुझे अमूल्य सहयोग प्रदान किया। आपके अविस्मरणीय सहयोग के लिए मैं आपका आभार व्यक्त करती हूँ।

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